उत्तराखंड में एसटी प्रमाणपत्रों पर बड़ा सवाल! 25 साल में जारी सभी जनजाति प्रमाणपत्रों की जांच की मांग, फर्जी पाए गए तो नौकरियां, पदोन्नतियां और सरकारी लाभ भी रडार पर

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देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने राज्य गठन के बाद जारी सभी एसटी प्रमाणपत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि यदि नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं, तो उनके आधार पर प्राप्त नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों और अन्य सरकारी लाभों की भी समीक्षा होनी चाहिए।

 

इस संबंध में विकेश सिंह नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र भेजकर वर्ष 2000 से अब तक जारी एसटी प्रमाणपत्रों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यह मामला केवल प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान, राष्ट्रपति की अधिसूचनाओं, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।

 

नेगी ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को है। इस सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन या नई जाति को शामिल करने का अधिकार केवल संसद के पास सुरक्षित है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति सूची को उसी रूप में स्वीकार किया जाएगा, जैसा राष्ट्रपति की अधिसूचना में उल्लेखित है।

 

उन्होंने आरोप लगाया कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से एसटी प्रमाणपत्र जारी होने को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। उनका कहना है कि यदि गलत व्याख्याओं या नियमों के विपरीत प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं और उनके आधार पर सरकारी नौकरियां, पदोन्नतियां, छात्रवृत्तियां, मुआवजे, भूमि आवंटन अथवा आरक्षण का लाभ लिया गया है, तो उन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

 

विकेश सिंह नेगी ने दावा किया कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से इतर नामों या उपजातियों के आधार पर भी एसटी प्रमाणपत्र जारी किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि ऐसा पाया जाता है तो यह संवैधानिक व्यवस्था और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की भावना के विपरीत माना जाएगा।

 

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) फैसले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने सामाजिक न्याय के उद्देश्य से उप-वर्गीकरण की अनुमति दी है, लेकिन अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में नई जाति जोड़ने अथवा नाम परिवर्तन का अधिकार केवल संसद के पास ही है।

 

नेगी ने यह भी बताया कि इस विषय पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय से भी पत्राचार किया गया था। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों से जुड़ा विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के अंतर्गत आता है और अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है।

 

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में उन्होंने मांग की है कि वर्ष 2000 के बाद जारी सभी विवादित एसटी प्रमाणपत्रों की जांच कराई जाए। जो प्रमाणपत्र संवैधानिक और वैधानिक मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाएं, उन्हें निरस्त किया जाए। साथ ही ऐसे प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों की विधिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

 

उन्होंने यह भी मांग उठाई कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ विभागीय, दंडात्मक और आपराधिक कार्रवाई की जाए। साथ ही सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, पंचायत और स्थानीय निकायों से ऐसे लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बन सके।

 

विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह मुद्दा लाखों युवाओं के भविष्य और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस विषय पर समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई नहीं करती है तो इस मामले को न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाएगा।

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