चश्मदीदों की गवाही और पुख्ता साक्ष्य नहीं जुटा सका अभियोजन, कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ
रुद्रपुर। सितारगंज के चर्चित प्रताप सिंह बिष्ट हत्याकांड में प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश आरके श्रीवास्तव की अदालत ने छह जीवित आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश के आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं कर सका। साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया। मामले से जुड़े शस्त्र अधिनियम के आरोपों में भी आरोपियों को राहत मिली।
मामला 13 दिसंबर 2014 का है। शक्तिफार्म स्थित लक्की ऑटो पार्ट्स की दुकान पर चाय पी रहे प्रताप सिंह बिष्ट पर बाइक सवार बदमाशों ने फायरिंग कर दी थी। हमले में प्रताप सिंह बिष्ट की मौत हो गई थी, जबकि नागेंद्र सिंह और अभय नारायण सिंह घायल हुए थे। मृतक के भतीजे राकेश सिंह बिष्ट की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।
पुलिस की विवेचना में खनन और प्लाटिंग विवाद को वारदात की वजह बताते हुए मनोज सिंह अधिकारी, गोविंद सिंह टाकुली, वजाहत खां, मंसूर अली और यतीन्द्र चौहान पर साजिश रचने तथा मोहम्मद शहजाद, मोहम्मद साहिब और वसीम के जरिए वारदात कराने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने आरोपियों से असलहे बरामद होने का भी दावा किया था।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपों और विवेचना पर सवाल उठाए। अदालत के समक्ष यह भी आया कि घटना की प्राथमिकी अज्ञात के खिलाफ दर्ज हुई थी और आरोपियों की विधिवत शिनाख्त नहीं कराई गई। अभियोजन पक्ष मुख्य गवाह योगेंद्र सिंह रावत और अविनाश सिंह को भी न्यायालय में परीक्षित नहीं करा सका।
आरोपियों की गिरफ्तारी और असलहा बरामदगी के समय स्वतंत्र गवाह नहीं होने तथा सीडीआर के साथ भारतीय साक्ष्य कानून की धारा 65बी के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किए जाने को लेकर भी साक्ष्य पर सवाल उठे। इन परिस्थितियों में अदालत ने अभियोजन की कहानी को आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अदालत ने मोहम्मद शहजाद, मोहम्मद साहिब, मनोज सिंह अधिकारी, गोविंद सिंह टाकुली, वजाहत खां और मंसूर अली को दोषमुक्त कर दिया। वहीं मुकदमे की सुनवाई के दौरान यतीन्द्र चौहान और वसीम की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ कार्यवाही पहले ही समाप्त की जा चुकी थी।
