रुद्रपुर/देहरादून।
शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और सुलभता के दावों के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कक्षा 7 की अंग्रेजी पुस्तक ‘पूरवी’ की कीमत को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। जहां एक ओर एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित इसी पुस्तक की कीमत मात्र 65 से 70 रुपये के आसपास दर्ज है, वहीं उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा विभाग द्वारा वितरित की जा रही इसी पुस्तक पर 117.92 रुपये मूल्य अंकित है। यानी एक ही किताब के लिए अभिभावकों को लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है।
मामला सामने आने के बाद अभिभावकों और सामाजिक संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि सरकारी स्तर पर ही इस तरह का मूल्य अंतर समझ से परे है। खासकर तब, जब सरकार शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाने की बात करती है।
जानकारी के अनुसार, एनसीईआरटी की मूल पुस्तक दिल्ली से प्रकाशित होती है, जिसकी प्रिंटिंग लागत कम होने के चलते इसका मूल्य भी कम रखा जाता है। वहीं उत्तराखंड में इसी पुस्तक को स्थानीय स्तर पर दोबारा छपवाया गया है। विभाग का तर्क है कि परिवहन, प्रिंटिंग क्वालिटी और अन्य प्रशासनिक खर्चों के कारण कीमत में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी कीमत वृद्धि उचित नहीं ठहराई जा सकती।
अभिभावकों का कहना है कि एक या दो किताबों में यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन पूरे सत्र की सभी पुस्तकों को जोड़ने पर यह अतिरिक्त बोझ सैकड़ों रुपये तक पहुंच जाता है। इससे मध्यम और गरीब वर्ग के परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है।

इस मामले में शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार की गई हैं और कीमत निर्धारण में पारदर्शिता बरती गई है। बावजूद इसके, अब इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है और अभिभावक सरकार से जांच की मांग कर रहे हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक ही किताब के लिए अलग-अलग दाम वसूले जा रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामग्री उचित कीमत पर उपलब्ध हो सके।



