उत्तराखंड में साइबर अपराध के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं और यह अब आम जनता के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। डिजिटल अरेस्ट, फर्जी निवेश, ऑनलाइन ट्रेडिंग और सेक्सटॉर्शन जैसे साइबर फ्रॉड के मामलों में प्रदेश के हजारों लोग अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा चुके हैं। उत्तराखंड पुलिस द्वारा जारी आंकड़े इस खतरे की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।
पुलिस आंकड़ों के मुताबिक बीते पांच वर्षों में साइबर ठगों ने प्रदेश की आम जनता से करीब 500 करोड़ रुपये की ठगी की है। इस दौरान साइबर क्राइम से जुड़ी लगभग 99 हजार शिकायतें दर्ज की गईं। हालांकि राहत की बात यह नहीं है कि ठगी गई रकम में से अब तक केवल करीब 70 करोड़ रुपये ही रिकवर हो सके हैं। यह आंकड़े सिर्फ उन्हीं मामलों के हैं, जो सीधे साइबर हेल्पलाइन 1930 पर दर्ज हुए, जबकि बड़ी संख्या में लोग आज भी शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं।
हर दिन साइबर ठगी के नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं। मोबाइल फोन, जो कभी सुविधा का साधन था, आज साइबर अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। एक कॉल, एक मैसेज या एक लिंक पर क्लिक करते ही लोगों के बैंक खाते खाली हो जा रहे हैं।
साइबर ठग डिजिटल अरेस्ट स्कैम के जरिए वीडियो कॉल पर सरकारी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। एआई आवाज क्लोनिंग के जरिए परिचित की आवाज बनाकर पैसे मंगाए जाते हैं। फर्जी निवेश एप, आरटीओ चालान लिंक, नकली लोन ऑफर, ऑनलाइन शॉपिंग फ्रॉड, सोशल मीडिया अकाउंट हैक, कस्टमर केयर स्कैम, क्यूआर कोड फ्रॉड और वर्क फ्रॉम होम स्कैम जैसे तरीके तेजी से फैल रहे हैं। अब तो ऑनलाइन दस्तावेजों के जरिए जमीन हड़पने और फर्जी पुलिस नोटिस भेजकर वसूली तक की घटनाएं सामने आ रही हैं।
एसएसपी एसटीएफ नवनीत भुल्लर ने लोगों से अपील की है कि किसी भी संदिग्ध कॉल, मैसेज या लिंक की तुरंत शिकायत 1930 पर दर्ज कराएं। ओटीपी साझा न करें, अनजान लिंक न खोलें और बिना सत्यापन किसी को भी अपनी निजी जानकारी न दें। साइबर अपराध से बचाव के लिए सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है।



